रिपोर्टर विजेन्द्र कुमार मौर्या राबर्ट्सगंज सोनभद्र PNP news।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सोनभद्र। चोपन ब्लॉक के गोठानी क्षेत्र स्थित रेणू-विजूल और सोन नदी के त्रिवेणी संगम को अब पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान मिलने जा रही है। 15वीं शताब्दी में बने ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को ईको पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना को शासन से स्वीकृति मिल गई है।इसके साथ ही पर्यटन विभाग ने परियोजना को धरातल पर उतारने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्राकृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से समृद्ध इस स्थल को विकसित कर जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल किया जाएगा।
पर्यटन विभाग का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद यह क्षेत्र न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं बल्कि प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनेगा।
योजना के तहत यह होना है काम
योजना के तहत ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर से संगम तट तक एक सुंदर ईको कॉरिडोर का निर्माण कराया जाएगा। यह कॉरिडोर श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मंदिर से संगम तक सहज, सुरक्षित और आकर्षक मार्ग उपलब्ध कराएगा। विकास कार्यों में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता बनी रहे।पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं का विस्तार, बैठने की व्यवस्था, सौंदर्यीकरण तथा आकर्षक पर्यटन संरचना विकसित की जाएगी। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
नदियों का स्वरूप और जल प्रवाह
रेणू-विजूल और सोन नदी का संगम इस क्षेत्र की प्रमुख प्राकृतिक पहचान है। सोन नदी मध्य भारत की महत्वपूर्ण बारहमासी नदियों में शामिल है, जिसमें वर्षभर जल प्रवाहित होता है। वहीं रेणू नदी छत्तसीगढ़ से होते हुए सोन में आकर समाहित होती है। वहीं विजूल नहीं सिंगरौली मध्य प्रदेश से आती है।
रेणू-विजूल नदी में सामान्य दिनों में सीमित जल रहता है, लेकिन वर्षा ऋतु में इसका प्रवाह काफी बढ़ जाता है। बरसात के मौसम में दोनों नदियों का संगम अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है, जो प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है।15 वीं शताब्दी में हुआ था सोमनाथ मंदिर का निर्माण
मौजूद लेख पत्रों की माने तो सोमनाथ मंदिर का निर्माण 15 वीं सदी में हुआ था। उस समय अगोरी पर खरवार राजवंश का अधिपत्य था। मंदिरों के निर्माण में राजा मुलागत की भूमिका के अभिलेख मिलते हैं। इस स्थान से वीर लोरिक का भी जुड़ाव रहा है।
इस स्थान पर सैकड़ों मूर्तियों को खोदाई में निकाला गया है। इसमें 12वीं सदी तक के कला और संस्कृति सामने आती हैं। दर्जनों शिलापट्ट ऐसे मिले हैं जिनमें लिखी भाषा के बारे में आज भी रहस्य कायम है। यहां अगोरी राज्य का राजकीय चिह्न भी मौजूद है। अगोरी किले और वीर लोरिक के किस्से से भी इस मंदिर का संबंध रहा है।
गोठानी के रेणू-विजूल और सोन नदी के संगम तट पर ईको कॉरिडोर विकसित करने के लिए शासन से स्वीकृति मिल गई है। सोमनाथ मंदिर से संगम तट तक कॉरिडोर निर्माण के साथ कई अन्य विकास कार्य कराए जाएंगे। बजट को लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है, जल्द वह भी सामने आ जाएगा। -राजेश भारती, जिला पर्यटन अधिकारी।











