मनोज कुमार
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!किसी भी देश के इतिहास की जानकारी में एतिहासिक साक्ष्यों के विश्लेषण प्रमुख श्रोत माना जाता है जिससे इतिहासकारों द्वारा जानकारी एकत्र कर तत्कालीन सभ्यता एवं संस्कृति के साथ उत्थान एवं पतन का विवेचना इतिहास के पन्नों में किया जाता है।
हुलास गंज प्रखंड अंतर्गत लाट गांव स्थित जाट की एतिहासिक महता इतिहासकारों के लिए बहुत है लेकिन ग्रामीणों ने बताया कि सरकार के नजर में इसकी महत्ता न के बराबर है। इसके संरक्षण को लेकर सरकार द्वारा कोई भी कदम नहीं उठाया जाना इसका प्रमाण है।लाट ग्राम में लगभग 50–53 फीट ऊँचा बलुआ-पत्थर का स्तंभ है, जिसे स्थानीय लोग मौर्यकाल (अशोक-काल) की प्राचीन धरोहर मानते हैं।जो लाट के जाट के नाम से जाना जाता है।
स्तंभ और उससे जुड़ी कथा के कारण गाँव का नाम “लाट” और कहावत “लाट का जाट” स्थानीय पहचान एवं गर्व का स्रोत बन गई है। छोटा गाँव होने के बावजूद इस धरोहर की वजह से लाट ग्राम को मगध क्षेत्र में विशेष ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठा प्राप्त है।इस जाट को लेकर लोगों की आस्था जुड़ गयी है।गाँव में यह स्तंभ “जाट बाबा” या “लाट के जाट” के रूप में पूजित है और इसके साथ कई पौराणिक/लोककथाएँ जुड़ी हैं। किंवदंती है कि राक्षसों द्वारा इस विशाल जाट को रातो रात ले जाया जा रहा था लेकिन गांव के पास पंहुचते ही यहां रह रहे कुम्हारों द्वारा रात में मिट्टी के बर्तन बनाने में उत्पन्न होने वाले आवाज से विशालकाय शिला को रख दिया गया।यह कथा त्रेता युग की बताई जाती है।ग्रामवासियों की नियमित पूजा, आषाढ़ी मेले और ध्वजा चढ़ाने की परंपरा ने इस स्तंभ को केवल पुरातात्विक नहीं, बल्कि धार्मिक केंद्र भी बना दिया है।
इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन ने 1812 में लाट ग्राम (बिहार के जहानाबाद जिले में) के स्तंभ का विस्तृत वर्णन अपनी यात्रा डायरी में दर्ज किया। उन्होंने 29 जनवरी 1812 को इस 53 फीट ऊंचे पत्थर के स्तंभ को देखा, जो मौर्य काल का माना जाता है । बुकानन ने स्तंभ को मजबूत, अविभाजित पाषाण निर्मित बताया, जिसका व्यास लगभग 6 फीट बताया है।और शीर्ष पर कोई शिलालेख या चित्रण नहीं है।
स्तंभ के दोनों सिरे आयताकार है जबकि बीच का भाग बारह फलको में गोलाकार है।लोग आकर इस विशालकाय शिला स्तंभ को देखने तो दूर दूर से आते हैं लेकिन इसकी महत्ता की समुचित जानकारी नहीं मिल पाती है। लोगों के लिए यह सोचनीय प्रश्न है कि आखिर मैदानी भाग में इतने भारी-भरकम शिला स्तंभ को यहां तक आखिर किस प्रयोजन से लाया गया है।











