November 2, 2026 8:50 pm

न थाना, न कोर्ट-कचहरी… सोनभद्र के इस गांव में आज भी पंचायत ही सुनाती है फैसला, दोषी को दी जाती है अजीबो-गरीब सजा

रिपोर्टर विजेन्द्र कुमार मौर्या राबर्ट्सगंज सोनभद्र PNP NEWS

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उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के बीजपुर थाना क्षेत्र स्थित आदिवासी बहुल महुली गांव अपनी अनोखी पंचायत व्यवस्था के लिए चर्चा में है. यहां छोटे-बड़े विवादों के समाधान के लिए न थाना जाना पड़ता है और न ही कचहरी.पारिवारिक झगड़े, जमीन विवाद, मारपीट, गाली-गलौज और चोरी जैसे मामलों का निपटारा गांव की पंचायत ही करती है. दोषी पाए जाने पर उसे जेल या जुर्माने की जगह गांव वालों को गुड़ खिलाने और पानी पिलाने जैसी सामाजिक सजा दी जाती है.

 

1980 से चली आ रही है पंचायत की परंपरा

 

महुली गांव में करीब 1063 परिवार रहते हैं. यहां गोंड, धरकार, यादव, विश्वकर्मा समेत कई समुदायों के लोग निवास करते हैं. गांव में पंचायत की यह व्यवस्था वर्ष 1980 से लगातार जारी है. पंचायत के फैसलों को लिखित रूप में रजिस्टर में दर्ज किया जाता है और दोनों पक्ष अंगूठा लगाकर समझौते की पुष्टि करते हैं, ताकि भविष्य में कोई अपनी बात से मुकर न सके.

 

हर रविवार लगती है पंचायत

 

गांव में पंचायत की बैठक प्रत्येक रविवार आयोजित होती है. हर महीने औसतन चार से पांच मामले पंचायत के सामने आते हैं. इनमें पति-पत्नी, सास-बहू, भाइयों के बीच विवाद, जमीन के झगड़े और चोरी जैसे मामले प्रमुख होते हैं. पंच आपसी सहमति से समाधान निकालते हैं और दोषी की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सामाजिक दंड तय करते हैं.चोरी पर सामान लौटाना और सार्वजनिक माफी जरूरी

 

मुख्य पंच रामकिशुन, जो वर्ष 1980 से 2005 तक ग्राम प्रधान भी रहे, बताते हैं कि चोरी के मामलों में दोषी को चोरी का सामान वापस करना पड़ता है. इसके बाद पंचायत के सामने कान पकड़कर माफी मांगनी होती है. यदि कोई पंचायत के फैसले को मानने से इनकार करता है तो पूरा गांव उसका सामाजिक बहिष्कार कर देता है.जमीन विवाद में ली जाती है लेखपाल की मदद

 

यदि जमीन से जुड़ा मामला अधिक जटिल होता है तो लेखपाल को बुलाकर नापजोख कराई जाती है. हालांकि अंतिम फैसला पंचायत ही सुनाती है. गांव वालों का कहना है कि इस व्यवस्था से वर्षों से अधिकांश विवाद बिना कोर्ट-कचहरी पहुंचे ही समाप्त हो जाते हैं.

 

अंधविश्वास के खिलाफ भी पंचायत का सख्त रुख

 

मुख्य पंच रामकिशुन ने बताया कि एक बार गांव में झाड़-फूंक करने वाले सोखा ने किसी व्यक्ति पर भूत-प्रेत का साया होने का दावा किया था. उन्होंने सोखा से कहा कि यदि वह भूत दिखा दे तो उसकी बात मान ली जाएगी, अन्यथा “मार-मार कर तुम्हारा भूत उतार दूंगा.” यह सुनते ही सोखा वहां से भाग गया. उनका कहना है कि शिक्षा के प्रसार के साथ गांव में अंधविश्वास भी धीरे-धीरे कम हो रहा है.

 

पिता की सेवा नहीं करने पर जमीन का हिस्सा बदलने का फैसला

 

गांव के भुवनेश्वर सिंह बताते हैं कि एक मामले में तीन बेटे अपने पिता की देखभाल नहीं करना चाहते थे. पंचायत ने फैसला सुनाया कि जो बेटा पिता की सेवा करेगा, उसेपिता की 10 बिस्वा जमीन दी जाएगी. अंततः तीनों बेटों ने पंचायत का निर्णय स्वीकार कर लिया.पुलिस भी नहीं करती पंचायत के फैसलों में हस्तक्षेप

 

गांव के लोगों का कहना है कि थाने और अदालत में समय व पैसे की बर्बादी होती है, इसलिए वे पंचायत पर अधिक भरोसा करते हैं. पुलिस भी सामान्यतः पंचायत के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करती. गांव में केवल सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए समय-समय पर गश्त की जाती है.

 

आसपास के कई गांवों में भी यही परंपरा

 

महुली के अलावा रजमिलान, अमरसोट्टा, चोरपनिया, छाताडांड, करमसर, खादर, पहाड़पट्टी, हरिपुर, तूरीपान, सेमरिया समेत कई आदिवासी बहुल गांवों में भी छोटे विवाद पंचायत के माध्यम से आपसी सहमति से निपटाए जाते हैं.

 

क्या कहते हैं ग्राम प्रधान और एसपी?

 

मीडिया रेपोर्ट्स के अनुसार महुली की ग्राम प्रधान जुकमनिया देवी का कहना है कि गांव के अधिकांश विवाद पंचायत में ही सुलझ जाते हैं और शायद ही कभी पुलिस की मदद लेने की नौबत आती है. वहीं, एसपी अभिषेक वर्मा का कहना है कि छोटे विवादों का आपसी सहमति से समाधान होना अच्छी बात है, लेकिन जरूरत पड़ने पर पुलिस हर समय लोगों की सहायता के लिए उपलब्ध है.

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