November 2, 2026 9:38 pm

उत्तर प्रदेश सोनभद्र: पत्थर भी देते हैं मौसम के संकेत! सोनभद्र में मेगालिथ शिलाएं बता देती हैं, कब आ रहा मॉनसून

। रिपोर्टर विजेन्द्र कुमार मौर्या राबर्ट्सगंज सोनभद्र PNP news।

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सोनभद्र: यहां के म्योरपुर ब्लाक की रास पहरी और मधुबन की मुर गुड्डी पहाड़ी पर मौजूद हजारों वर्ष पुराने मेगालिथ (महापाषाण) आज भी आदिवासी समाज के लिए मौसम का प्राकृतिक संकेतक माने जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि जब इन विशाल पत्थरों की सतह पर नमी से पानी की महीन बूंदें उभरने लगती हैं, तब कुछ ही दिनों में अच्छी बारिश होती है। भले ही इस परंपरा को लेकर वैज्ञानिक पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन आदिवासी समाज सदियों से इस लोकज्ञान को अपनी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा मानता आ रहा है।

 

 

‘पसीजने’ लगते हैं पत्थर

 

म्योरपुर के रास पहरी पहाड़ी और मधुबन स्थित मुर गुड्डी पहाड़ी पर स्थापित प्राचीन मेगालिथ स्थल आदिवासी संस्कृति, लोक परंपरा और प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव की अनूठी पहचान है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि वर्षा आने से पहले इन विशाल पत्थरों की सतह पर सुबह के समय असामान्य नमी, जल की महीन बूंदें, रंग में बदलाव और काई की नमी बढ़ जाती है। लोगों का विश्वास है कि जब पत्थर ‘पसीजने’ लगते हैं, तब मानसून दूर नहीं होता। वे इसे मानसून के जल्द आने का संकेत मानते हैं। राम वृक्ष गोंड, बेचन, सूरजमन, धन सिंह और मोहर शाह जैसे ग्रामीण बताते हैं कि मान्यता की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। आज भी इन संकतों पर पूरा भरोसा किया जाता है। मान्यता को वैज्ञानिक खारिज नहीं करते

 

वैज्ञानिक दृष्टि से इस मान्यता की अभी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया गया है। भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में बढ़ती आर्द्रता, स्थानीय सूक्ष्म जलवायु और चट्टानों की संरचना के कारण उनकी सतह पर संघनन दिखाई दे सकता है, जो मानसून के निकट आने का संकेत हो सकता है।

पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन की जरूरत

 

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए, तो यह मौसम विज्ञान, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। विडंबना यह है कि इतनी महत्वपूर्ण धरोहर होने के बावजूद इन मेगालिथ स्थलों पर आज भी पर्याप्त सुरक्षा, घेराबंदी और सूचना पट्टों का अभाव है।

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