रिपोर्टर विजेन्द्र कुमार मौर्या राबर्ट्सगंज सोनभद्र PNP news।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सोनभद्र जंगल, जमीन और जलस्रोतों की रक्षा को लेकर सोनभद्र में आदिवासी समाज ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के नेतृत्व में सोमवार को आदिवासी-बनवासी समुदाय के लोगों ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के जिलाध्यक्षों को ज्ञापन सौंपकर जंगलों की कटाई, विस्थापन और प्रस्तावित परियोजनाओं के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।प्रतिनिधिमंडल ने साफ कहा कि विकास के नाम पर यदि उनके अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों पर हमला हुआ तो आंदोलन गांव से लेकर दिल्ली तक पहुंचाया जाएगा।
मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा के नेतृत्व में पहुंचे सैकड़ों ग्रामीणों और आदिवासी प्रतिनिधियों ने राजनीतिक दलों से मांग की कि वन क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले स्थानीय लोगों की सहमति और जनभावनाओं का सम्मान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज के जीवन का आधार हैं और इन्हें किसी भी कीमत पर नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।
जंगल नहीं, जीवन की धड़कन हैं पेड़
संदीप मिश्रा ने कहा कि सोनभद्र के वन क्षेत्रों पर लगातार बढ़ते औद्योगिक दबाव ने आदिवासी समाज की आजीविका, संस्कृति और पहचान को संकट में डाल दिया है। उन्होंने कहा कि जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि लाखों लोगों के जीवन, जलस्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ हैं। यदि जंगल समाप्त हुए तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा।”पेड़ हैं तो प्राण हैं”अभियान के सह-संयोजक गुलाब चेरो ने भावुक शब्दों में कहा कि एक भी पेड़ कटने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जंगलों की रक्षा के लिए समाज हर स्तर पर संघर्ष करेगा और आवश्यकता पड़ने पर बड़ा जनांदोलन खड़ा किया जाएगा।जंगल हमारा घर, हमारी पहचान’
नगवां ब्लॉक संयोजक विन्दू खरवार ने कहा कि जंगल आदिवासी समाज का घर, इतिहास और पहचान हैं। पूर्वजों ने पीढ़ियों तक इन जंगलों को सहेजकर रखा है और अब उनकी रक्षा करना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि जंगलों से ही रोजगार, संस्कृति और परंपराओं का अस्तित्व जुड़ा हुआ है।जिला संयोजक रामसूरत खरवार ने विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिले में स्थापित बड़े उद्योगों और परियोजनाओं से स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार नहीं मिला। उन्होंने पूछा कि विकास के नाम पर आखिर मूलनिवासियों को क्या मिला? यदि विकास का अर्थ विस्थापन और बेदखली है तो उसका लोकतांत्रिक तरीके से पुरजोर विरोध किया जाएगा।
लखनऊ से दिल्ली तक गूंजेगी आवाज
आदिवासी नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि जंगलों की कटाई और विस्थापन की प्रक्रिया नहीं रुकी तो गांव-गांव जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। आंदोलन की आवाज जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचाई जाएगी। उन्होंने राजनीतिक दलों से जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा के लिए ठोस नीति बनाने औरजनहित को प्राथमिकता देने की मांग की।पूरे कार्यक्रम के दौरान “जंगल बचाओ, जीवन बचाओ” और “पेड़ हैं तो प्राण हैं” जैसे नारों से माहौल गूंजता रहा। बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान, ग्रामीण और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से रामसूरत खरवार, विन्दू अगरिया, रामहाल खरवार, गुलाब चेरो, दिनेश पनिका, टहलराम माझी, आकाश चौहान, सत्रुधन बिन्द, सूरज कनौजिया, संजय बियार, सुजीत विश्वकर्मा, नागेंद्र धागर सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और जंगल संरक्षण के संकल्प को दोहराया।











