November 2, 2026 5:54 pm

देशभर में अक्षय तृतीया की धूम, भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है इसका प्राचीन इतिहास

रेवाड़ी, पीएनपी न्यूज़ | चीफ ब्यूरो: दीपक तिवारी | संवाददाता: डॉ. राजकुमार यादव

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

प्रतिवर्ष वैषाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला अक्षय तृतीया पर्व इस वर्ष भी बड़े हर्षोल्लास के साथ जैन मंदिर, धारूहेड़ा में मनाया गया। इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राजकुमार यादव ने श्रद्धालुओं के साथ मिलकर उत्सव मनाया तथा भीषण गर्मी में राहगीरों को राहत पहुंचाने हेतु मंदिर के सामने स्टॉल लगाकर दिनभर नींबू व पुदीने से युक्त गन्ने का शीतल एवं स्वादिष्ट रस वितरित किया।

अक्षय तृतीया का यह पर्व अत्यंत प्राचीन है और इसका मूल आधार प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा हुआ है। जैन धर्म के अनुसार यह पर्व करोड़ों वर्ष पुरानी परंपरा का प्रतीक है।

भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा के पश्चात मुनि मुद्रा धारण कर छह माह तक मौन साधना की। इसके बाद वे प्रथम आहारचर्या के लिए निकले। उल्लेखनीय है कि तीर्थंकर भूख शांत करने के लिए नहीं, बल्कि लोक में आहारदान की परंपरा स्थापित करने हेतु आहार ग्रहण करते हैं।

उस समय आहारदान की परंपरा प्रचलित नहीं थी, जिसके कारण उचित विधि के अभाव में भगवान ऋषभदेव सात माह तक निराहार रहे। तत्पश्चात वे हस्तिनापुर पहुंचे, जहां राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म का स्मरण हुआ। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और विनय के साथ भगवान को इक्षुरस (गन्ने का रस) अर्पित कर प्रथम आहारदान किया।

इस पावन घटना के उपलक्ष्य में देवों द्वारा पंच आश्चर्य प्रकट हुए—1. रत्न वर्षा 2. पुष्प वर्षा 3. दुंदुभि वाद्यों का निनाद 4. शीतल एवं सुगंधित पवन का प्रवाह 5. “अहो दानम्” की दिव्य ध्वनि इसी दिन से आहारदान की परंपरा का प्रारंभ हुआ और राजा श्रेयांस “दानतीर्थ प्रवर्तक” के रूप में विख्यात हुए।

मान्यता है कि इस दिन भगवान ऋषभदेव का प्रथम आहार हुआ था, जिसके प्रभाव से राजा श्रेयांस की रसोई अक्षय (कभी समाप्त न होने वाली) हो गई थी। इसी कारण यह तिथि “अक्षय तृतीया” के नाम से प्रसिद्ध हुई।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया दान, जप, तप और शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करते हैं। यही कारण है कि अक्षय तृतीया को बिना मुहूर्त देखे विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्यों का शुभारंभ किया जाता है।यह पर्व न केवल आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि दान, सेवा और मानवता के संदेश को भी समाज में प्रसारित करता है।

और पढ़ें

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें