रिपोर्टर विजेन्द्र कुमार मौर्या राबर्ट्सगंज सोनभद्र PNP news।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!देश में एक ओर पेट्रोल-डीजल बचाने और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की जोरदार मुहिम चल रही है। वहीं दूसरी ओर रोडवेज बसों में नेताओं के लिए आरक्षित सीटें मानो लोकतंत्र का ‘साइलेंट कॉर्नर’ बन गई हैं।बसों में आज भी चमचमाते अक्षरों में ‘विधायक’, ‘सांसद’ और ‘मंत्री’ लिखा दिखाई देता है, लेकिन इन सीटों पर बैठने वाले जनप्रतिनिधि शायद अब जनता की बस से बहुत दूर निकल चुके हैं।
रोडवेज की वीआईपी सीटें खाली
हाल ही में कई नेताओं के टोटो और सार्वजनिक साधनों से सफर करने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। जनता ने इसे सराहा भी और तंज भी कसे। लेकिन सवाल वही पुराना है- जब सरकार खुद सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की बात कर रही है, तो फिर रोडवेज की वीआईपी सीटें सालों से खाली क्यों घूम रही हैं?
जाने बसों में क्यों आरक्षित की गई थी सीटें
दरअसल, यह व्यवस्था कभी लोकतंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। सोच यह थी कि विधायक और सांसद आम यात्रियों के बीच सफर करेंगे, रास्ते की धूल खाएंगे, बसों की भीड़ देखेंगे और जनता की दिक्कतों को करीब से समझेंगे। मगर समय बदला और नेताओं कीयात्रा बसों से निकलकर लालबत्ती, सुरक्षा घेरे और काफिलों तक पहुंच गई।
बसों में सफर करने पर पता चलेगी परेशानी
आज हालत यह है कि एक ओर यात्री खड़े-खड़े सफर करने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर ‘माननीय सीट’ पूरे रास्ते खाली हवा खाती रहती है। यात्रियों का कहना है कि अगर जनप्रतिनिधि कभी-कभार रोडवेज बसों में सफर करें, तो उन्हें खराब सड़कें, टिकट व्यवस्था की अव्यवस्था और यात्रियों की परेशानियों का असली अहसास हो सके।
‘लोकतंत्र केवल भाषणों से मजबूत नहीं होता’
विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकतंत्र केवल भाषणों से नहीं, बल्कि जनता के साथ सफर करने से मजबूत होता है। फिलहाल रोडवेज बसों की खाली आरक्षित सीटें यही कहती नजर आती हैं- ‘जनता अब भी इंतजार में है, माननीय अभी रास्ते में हैं!’











