*भावपूर्ण श्रद्धांजलि**पत्रकार दीपक तिवारी हरियाणा
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो समय के साथ खत्म नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलों में गूंजती रहती हैं। भोजपुरी लोकसंस्कृति के ऐसे ही अमर स्वर थे गायत्री ठाकुर व्यास।
बिहार के बक्सर जिले के पावन धरती, गाँव डुभा की मिट्टी से उठी यह आवाज आज भोजपुरी लोकपरंपरा की अमर पहचान बन चुकी है। गायत्री ठाकुर व्यास जी केवल एक गायक नहीं थे, बल्कि भोजपुरी मानस गायन, भक्ति संगीत और लोकसंस्कृति के सच्चे साधक थे।
उनकी आवाज में ऐसी भक्ति और मिठास थी कि अगर कोई अनपढ़ व्यक्ति भी उनके गीत सुन ले, तो वह रामायण की कथा का भाव सहज ही समझ सकता था। उनका जीवन अत्यंत सादा था—कुर्ता-धोती, गाँव की मिट्टी से जुड़ाव और भक्ति की राह। वे मंच की चमक-दमक से दूर रहकर गाँव-गाँव में कार्यक्रम करना अधिक पसंद करते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि लोककला का असली सम्मान गाँव के लोगों से ही मिलता है।
गायत्री ठाकुर व्यास जी ने सोहर, भक्ति गीत, प्रसंग, निर्गुण, लोकगीत और मानस गायन जैसे अनेक विधाओं में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनके कई गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं, जैसे—
ए नाथ बिना चढ़वले नैया हम ना धोइब पइयाँ…”“छूट जाई फैक्ट्री से नौकरी…”
बाबा गइले, बाबूजी गइले, अंत समय मुँह मोड़ी ए गवारा गायत्री से…” “हमरा के चाही ना कमइया ए मोरे सैयाँ, लेकर आवा ट्रैक्टरवा ए पियवा…”
ये गीत केवल गीत नहीं हैं, बल्कि भोजपुरी समाज की भावनाओं, भक्ति और जीवन की सच्चाई का आईना हैं।
सबसे गर्व की बात यह है कि आज उनके गाए गीत अनेक गायकों और कथावाचकों के लिए रोज़गार का सहारा बन चुके हैं। भोजपुरी में जो भी मानस गाता या कथा सुनाता है, वह कहीं न कहीं गायत्री ठाकुर व्यास जी की परंपरा से प्रेरणा लेता है।
आज भले वे हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनके गीत और उनकी परंपरा हर सत्संग, हर कथा और हर भोजपुरी हृदय में गूंजती रहेगी।
उनकी कही पंक्ति आज सच प्रतीत होती है—“होता चर्चा घर-घर में,हो लोग देता बा आशीर्वाद हो,बड़ी मर्यादा अभी, मुअला के बाद हो…”











