November 2, 2026 7:00 pm

राणा सांगा की म्रत्यु 20मई 1528 ई. को कालपी में हुई थी

*रितिक कुमार वरिष्ठ पत्रकार जिला ब्यूरो चीफ

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व्यास भूमि
मनोज पाण्डेय
कालपी (जालौन)आज देश में सबसे अधिक चर्चा में हैं तो वो हैं राजा संग्राम सिंह जिन्हें देश और दुनियां राणा सांगा के नाम से जानती है ।आज हम अगर राणा सांगा की बात कर रहे हैं तो यूं ही नहीं ।राणा सांगा का कालपी से बहुत गहरा नाता है यह बात बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि मेवाड़ के राजा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा ने अपने जीवन की अंतिम सांस जनपद जालौन के ऐतिहासिक नगर कालपी में ली थी । जी हां साथियों राणा सांगा की म्रत्यु कालपी में हुई थी। पर यह निश्चित नहीं है कि कालपी के किस स्थान पर उन्होंन अपने प्राण त्यागे थे काफी खोजबीन की इतिहास को खंगाला पर निश्चित स्थान नहीं पता कर पाया । एक आद इतिहास के जानकारों ने काली हवेली का नाम लिया पर मेरा अखबार इसे प्रमाणित नहीं करता।
चलिए राणा सांगा का संक्षिप्त परिचय कराते हैं 12 अप्रैल 1482 को चित्तौडगढ में जन्मे राणा रायल के पुत्र थे । राणा सांगा की पत्नी का नाम रानी कर्णित था।
मेवाड़ के शासक राणा सांगा संग्राम सिंह के नाम से भी जाना जाता है एक महान योद्धा थे जिन्होंने 1509 से 1528 तक मेवाड़ पर शासन किया और बाबर के खिलाफ कई युद्ध लड़े। उन्होंने 100 से अधिक युद्ध लड़े जिनमें से अधिकांश में उन्हें जीत मिली खानवा के युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा ।राणा सांगा ने बाबर के खिलाफ कई युद्ध लड़े और उसे भारत में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की ।कई राजपूत रियासतों को एकत्रित करने की कोशिश की थी राणा सांगा इतने वीर थे कि एक भुजा एक आंख एक टांग न होने और शरीर में अस्सी से अधिक जख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया। सुल्तान मोहम्मद शाह मांडू के युद्ध में हारने व बंदी बनाने के बाद उन्हें उनके राज्य पुन: उदारता के साथ सौंप दिया यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है ।खानवा की लड़ाई में राणा जी को लगभग 80 घाव लगे थे उन्हें सैनिकों का भग्नावशेष भी कहा जाता है। बाबर भी अपनी आत्मकथा में लिखता है कि राणा सांगा अपनी वीरता और तलवार के बल पर अत्यधिक शक्तिशाली हो गया है। बाबर को खानवा के युद्ध में पूरी तरह से राणा ने परास्त किया और बाबर से बयाना का दुर्गा जीत लिया । इस प्रकार राणा सांगा ने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ दी ।16वीं शताब्दी के सबसे शक्तिशाली शासक थे । उनको हिंदूपत की उपाधि दी गई थी। इतिहास में उनकी गिनती महानायक तथा वीर के रूप में की जाती है मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने अपने संस्मरणों में कहा कि राणा सांगा भारत में सबसे शक्तिशाली शासक थे ।जब उन्होंने उनपर आक्रमण किया और कहा कि उन्होंने अपनी वीरता और तलवार से अपने वर्तमान उच्च गौरव को प्राप्त किया 80हजार घोड़े उच्चतम श्रेणी के 7 राजा 9 राव और 104 सरदारों व रावल 500 युद्ध हाथियों के साथ युद्ध लड़े अपने चरम पर संघ युद्ध के मैदान में एक लाख राजपूत का बल जुटा सकते थे ।मालवा गुजरात और लोधी सल्तनत की संयुक्त सेनाओं को हराने के बाद मुसलमानों पर अपनी जीत के बाद वह उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा बन गए। कहा जाता है कि सांगा ने 100 लड़ाइयां लड़ी थी अधिकांश में विजय हासिल की थी।
राणा सांगा ने खंनवा के युद्ध में
भाग लिया था। बाबरनामा में भी लिखा है कि राणांसांगा मेवाड सहित उत्तर भारत के एक मात्र सबसे ताकतवर शासक थे। एक आंख एक भुजा और एक पैर न होने तथा शरीर में 84 घाव होने के बाद भी राणांसांगा युद्ध में जाने की जिद पर अड़े थे तब उनके सरदारों ने बाबर के साथ लड़ाई को आत्मघाती बनाने के लिए उन्हें 20मई 1528 को जहर दे दिया जिसके चलते ऐतिहासिक नगर कालपी में उनकी मौत हो गई।

इनसैट—
इतिहास के आइने में में कालपी संक्षिप्त
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साथियों कालपी का इतिहास बहुत पुराना है अगर लिखना चाहें तो बहुत समय लगेगा पर संक्षिप्त में कुछ बताते हैं। 11वीं शताब्दी में कालपी बुन्देलखण्ड का एक महत्वपूर्ण केंद्र था जो राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से सक्रिय था ।इस दौरान कालपी पर विभिन्न राजवंशों का शासन रहा और यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ । यहां 11वीं सदी में कालपी के इतिहास के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हैं यहां ग्यारहवीं सदी से कालपी पर विभिन्न राजवंश जैसे चालुक्य राष्ट्रकूट और चंदेलों का शासन था । कालपी यमुना नदी के किनारे स्थित होने के कारण एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था ।यहां विभिन्न क्षेत्रों से व्यापारी आते थे साथ ही यह धार्मिक केंद्र भी था ।जहां विभिन्न धर्मो के लोग रहते थे 11वीं सदी में कालपी में विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां होती थी जैसे की कला साहित्य और संगीत। 11वीं सदी में कालपी में एक किले का निर्माण किया गया था जोक जो कि बाद में दिल्ली सल्तनत के शासको द्वारा इस्तेमाल किया गया ।1196 ई में मोहम्मद गौरी की सेनो ने कालपी पर विजय प्राप्त की ।जिन्होंने अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ मिलकर भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की ।दिल्ली सल्तनत के सभी राजवंशों मामलुक खिलजी तुगलक सैयद और लोदी ने कालपी के किले को एक गढ़ के रूप में इस्तेमाल किया ।जो यमुना पर संचार केंद्र के रूप में काम करता था। 15वीं शताब्दी में कालपी पर जौनपुर और मालवा के शासको के बीच संघर्ष हुआ और अंतत यह नगर मालवा के होशांग शाह के अधीन हो गया। 16वीं शताब्दी की शुरुआत में चित्तौड़ के राजपूत राजा राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को दो बार हराया और कालपी और चंदावर सहित उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। 1857 की क्रांति के दौरान कालपी एक महत्वपूर्ण केंद्र था जहां क्रांतिकारी और अंग्रेजी सेनाके साथ भयंकर युद्ध हुआ कालपी का इतिहास बहुत बड़ा है समय मिलने पर आपसे साझा करते रहेंगे।

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