तहसील संवाददाता अजीत कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!बैरिया बलिया। बलिया जिले के मुरली छपरा ब्लॉक में महिला आरक्षण की मंशा को उलटने वाली चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। ग्रामीणों का दावा है कि कई महिला ग्राम प्रधान गांव में रहकर जिम्मेदारियाँ निभाने के बजाय शहरों में बस गई हैं, जहाँ वे बच्चों की पढ़ाई और घरेलू दायित्वों में व्यस्त रहती हैं। परिणामस्वरूप पंचायत की बागडोर उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदार संभाल रहे हैं जो कानूनन पूरी तरह वर्जित है। ग्रामीणों के अनुसार, पंचायत संचालन से लेकर योजनाओं की मंजूरी, यहां तक कि निवास, आय प्रमाण पत्र जैसे संवेदनशील दस्तावेजों पर भी महिला प्रधान की जगह पुरुष प्रतिनिधि हस्ताक्षर कर रहे हैं। जबकि नियम स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर का अधिकार केवल निर्वाचित ग्राम प्रधान को ही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि महिला नेतृत्व को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लागू किया गया आरक्षण, कई जगहों पर सिर्फ नाम मात्र रह गया है। कागजों पर महिला प्रधान और जमीन पर पुरुष प्रतिनिधि यह ‘प्रॉक्सी मॉडल सरकार’ पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता दोनों पर सवाल खड़े कर रही है। इस मामले में जब जिला पंचायत राज अधिकारी (DDO) से बात की गई, तो उन्होंने कहा,“मामला संज्ञान में नहीं था। नियुक्त प्रधान को ही सभी कार्य करने चाहिए। नियम के विरुद्ध किसी भी प्रकार की हस्ताक्षर प्रक्रिया स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि खंड विकास अधिकारी (BDO), मुरली छपरा को तत्काल जांच कर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश जारी किया जाएगा। ग्रामवासियों का तर्क है कि यदि महिला प्रधान गांव में मौजूद ही नहीं हैं, तो विकास योजनाएँ कैसे बन रही हैं? सरकारी प्रमाण पत्र किसके निर्देश पर जारी हो रहे हैं? यह स्थिति पंचायत शासन व्यवस्था की मूल भावना को ही चुनौती देती दिखाई देती है। जांच शुरू होने के बाद, उम्मीद जताई जा रही है कि कई पंचायतों में चल रही ‘प्रॉक्सी सरकार’ की वास्तविकता उजागर होगी।











