दावथू का पुरातात्विक धरोहर-प्रखंड मुख्यालय से करीब 4किलोमीटर पुरव की ओर जलवार नदी के किनारे है।यहाँ सहस्त्रावदीयों के इतिहास के कालक्रम के होने की बात इतिहासकारों ने व्यक्त की हैI इस क्षेत्र की चर्चा सर्वप्रथम ईस्ट इण्डिया कंपनी के सर्वेक्षक ‘फ्रांसिस बुकानन’ ने अपने यात्रा वृतांत में किया हैI 30 जनवरी 1812 को इस गाँव का भ्रमण करने वाले बुकानन ने इस गांव का नाम देवस्थल बताया हैI अपने यात्रा वृतांत में बुकानन ने बताया की यहाँ मिटी का एक गढ़ है तथा गढ़ के दक्षिण-पूर्व में मुस्लिम संत का मजार हैI मजार के दक्षिण में पार्श्वनाथ का विशाल प्राचीन मंदिर के खंडहर होने की बात बताई गई थी I वर्तमान में प्राचीन शिव मंदिर के अलावे गढ़,विशाल पत्थरों को तराश कर बनाये गये मंदिर का मंडप और मजार का स्तीत्व मौजुद हैI इस गांव की गलियों और खेतों में अभी भी प्राचीन काल की अशंख्य मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैI गांव के नजदीक वासुदेव,लक्ष्मीनारायण,शिव-पार्वती, सरस्वती की बेशकीमती मूर्तियाँ अभी भी बची हुई हैI कुछ बेशकिमती मूर्तियों को राजकीय संग्रहालय गया और पटना में रखा गया हैI 7-8 वीं शताब्दी के बने भग्नावशेषों में प्राचीन मंदिर के मंडप की संरचना बनी हुई हैI माना जाता है की मूल रूप से गर्भ-गृह रहा होगाI यहाँ अभी भी काले प्रस्तर में सूर्य की भग्न प्रतिमा स्थित हैI नृत्य मुद्रा में शिव की मूर्ति भी अदभुत हैI
दावथू के मूर्त और अमूर्त अवशेष बौद्ध के पदचिन्हों को ही नहीं बल्कि शताव्दियों पुर्व से देवस्थल के रूप में पहचान रखने वाला यह क्षेत्र हिन्दू-मुस्लिम के गंगा-जमुनी तहजीब का भी धरोहर हैI पुरातात्विक और धार्मिक संगम का यह क्षेत्र भारत के प्राचीन इतिहास को जानने में काफी सहायक सिद्ध हो सकता है।
पिछले कुछ वर्ष पहले पर्यटन विभाग ने इस ऐतिहासिक स्थल को विकसित करने के दिशा में अपना काम शुरू तो किया लेकिन वो आज भी अधूरा है I एक एकड़ से अधिक क्षेत्रफल की घेराबंदी करने समेत पर्यटक विश्राम गृह,कैंटीन,गार्ड रुम,झरना और लाईट लगाने की योजना में से पहले चरण में लगभग 2 करोड़ की राशि खर्च कर चहारदीवारी निर्माण, गार्ड रुम, तालाब निर्माण सहित लाइटिंग और सौंदर्यीकरण का कार्य तो किया गया लेकिन देखरेख के अभाव में निर्माणाधीन स्थल जीर्ण शीर्ण हो रहा है I दूसरे चरण में यहाँ के प्राचीन मंदिर को भी आधुनिक बनाने का प्रस्ताव पर्यटन विभाग के पास था लेकिन वर्षों से निर्माण कार्य बंद है I साथ ही बचे हुए मूर्तियों और भग्नावशेषों को सुरक्षित रखने के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा हैI ग्रामीणों का मानना है कि महत्वपूर्ण भग्नावशेषों का तत्काल संरक्षण और स्थलों की खुदाई का कार्य बिना देर किये प्रारंभ किया जाना चाहिए था I
हालांकि देखा जाए तो भारत के प्राचीन सभ्यता, इतिहास, कला और संस्कृति के उदभेदन में यह क्षेत्र काफी हद तक सहायक होगा साथ ही पर्यटन की भी असीम संभावनाएं इस क्षेत्र में मौजुद हैI बौद्ध,जैन और सूफी धर्म के विकास का केन्द्र होने के कारण विदेशी शैलानियों को भी यह क्षेत्र आकर्षित करेगाI











